गुरु: तपती धूप में खिला हुआ फूल
सीखो कुछ उन शिरीष के फूलों से,
जो तपती धूप में भी खिल जाते हैं,
वैसे ही गुरु जीवन की गर्मी में,
मुस्कुराकर हमें राह दिखाते हैं।
भास्कर की तेज किरणों से,
वे कभी घबराते नहीं,
संघर्षों की आँधियों में भी,
अपने कर्तव्य से हटते नहीं।
देते हैं वे सीख जीवन की,
हर कठिन मोड़ पर डटे रहना,
चाहे आए कितनी भी बाधाएँ,
कभी न हारना, कभी न थकना।
उमस भरी दोपहर के जैसे,
कभी दिन भी भारी होते हैं,
पर गुरु की आशा के दीपक,
हर अंधेरे में उजाले बोते हैं।
इंतजार उन्हें भी रहता है,
सुकून भरी उस शाम का,
पर पहले जलकर खुद बनते हैं,
दीप किसी और के नाम का।
बाँटते हैं खुशियाँ हर पल,
ज्ञान का अमृत देते हैं,
दुख चाहे जितना गहरा हो,
हौसले से जीना सिखाते हैं।
कहते हैं वे हर विद्यार्थी से—
घबराना नहीं, रुकना नहीं,
डटकर करना हर मुश्किल का सामना,
क्योंकि हार कभी स्थायी नहीं।
एक दिन हर अंधकार हारेगा,
और तुम ही विजयी कहलाओगे,
गुरु के दिए उस प्रकाश से,
अपना जीवन उज्ज्वल बनाओगे।